सपनों की उड़ान
सपनों की उड़ान (एक सच्ची प्रेरणादायक कहानी)
रमेश झारखंड के एक छोटे से गाँव में रहने वाला एक साधारण लड़का था। उसके पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ घर-घर काम करके परिवार का गुज़ारा चलाती थीं। घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती थी। लेकिन इन सबके बावजूद रमेश के सपने बहुत बड़े थे। वह पढ़-लिखकर एक अच्छा अफसर बनना चाहता था।

गाँव के लोग अक्सर कहते, “इतनी गरीबी में पढ़ाई किस काम की?”
कुछ लोग उसका मज़ाक उड़ाते और कहते कि सपने देखना छोड़ दो। लेकिन रमेश का विश्वास कमजोर नहीं पड़ा। वह सरकारी स्कूल में पढ़ता था, जहाँ संसाधनों की कमी थी, लेकिन उसकी लगन मजबूत थी।

रमेश दिन में स्कूल जाता और शाम को अपने पिता के साथ खेतों में काम करता। रात में वह मिट्टी के तेल की लालटेन के नीचे पढ़ाई करता। कई बार थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, लेकिन वह खुद से कहता, “अगर आज नहीं पढ़ूँगा, तो कल भी यही ज़िंदगी रहेगी।” यही सोच उसे आगे बढ़ाती रही।
जब रमेश ने दसवीं पास की, तो घर की हालत और खराब हो गई। पढ़ाई छोड़ने की नौबत आ गई। उसी समय उसके एक शिक्षक ने उसकी मेहनत और लगन देखकर उसकी मदद की। उन्होंने रमेश को छात्रवृत्ति के बारे में बताया और फॉर्म भरवाने में सहयोग किया। छात्रवृत्ति मिलने के बाद रमेश की पढ़ाई जारी रही।

रमेश ने कठिन परिश्रम के साथ बारहवीं पास की और फिर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। वह रोज़ घंटों पढ़ाई करता, पुराने प्रश्न पत्र हल करता और अपनी कमियों पर काम करता। कई बार असफल भी हुआ, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
आखिरकार वह दिन आया जब रमेश ने एक प्रतिष्ठित सरकारी परीक्षा पास कर ली। जब परिणाम आया, तो पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। उसके माता-पिता की आँखों में आँसू थे—दुख के नहीं, गर्व के।
आज रमेश उसी गाँव के बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। उसकी कहानी यह साबित करती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर सपनों को पंख मिल जाएँ, तो वे उड़ान जरूर भरते हैं।
सीख:
👉 बड़े सपने वही पूरे करते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते।












