सलीम और आलस से लड़ाई
सलीम बहुत होशियार था, लेकिन उसका सबसे बड़ा दुश्मन था — आलस। वह हर काम को टाल देता था। “कल पढ़ लूँगा”, “अभी बहुत समय है” — ये उसके पसंदीदा वाक्य थे। इसी आदत की वजह से वह पढ़ाई में पीछे रहने लगा। परीक्षा के समय उसे जल्दी-जल्दी पढ़ना पड़ता और ठीक से कुछ समझ नहीं आता।

उसके माता-पिता परेशान थे। शिक्षक भी कहते, “सलीम में क्षमता है, लेकिन मेहनत की कमी है।”
यह बात सलीम सुन तो लेता था, लेकिन बदलने की कोशिश नहीं करता था।

एक दिन स्कूल में परिणाम घोषित हुआ। सलीम के अंक बहुत कम थे। पहली बार उसे अपने ऊपर शर्म आई। उस रात वह देर तक सो नहीं पाया। उसने खुद से सवाल किया, “अगर मैं ऐसे ही आलस करता रहा, तो मेरा भविष्य क्या होगा?”
अगले दिन से सलीम ने खुद को बदलने का फैसला किया। उसने सबसे पहले सुबह जल्दी उठने की आदत डाली। यह उसके लिए सबसे कठिन काम था। कई दिन वह अलार्म बंद करके फिर सो गया, लेकिन धीरे-धीरे आदत बन गई। उसने पढ़ाई के लिए निश्चित समय तय किया और खुद से वादा किया कि उस समय कोई बहाना नहीं बनाएगा।

शुरुआत में मन बहुत भटकता था। कभी मोबाइल देखने का मन करता, कभी खेलने का। लेकिन सलीम खुद को रोकता और याद करता कि आलस ने उसे कितना नुकसान पहुँचाया है। हर दिन थोड़ा-थोड़ा पढ़ने से उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा।
परीक्षा आई। इस बार सलीम ने बिना घबराहट के पेपर दिया। परिणाम आया तो उसके अंक पहले से काफी अच्छे थे। शिक्षक ने उसकी पीठ थपथपाई।
सलीम मुस्कुराया और समझ गया कि आलस छोड़ते ही रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं।
सीख: आलस छोड़ो, सफलता खुद चलकर आएगी।














